पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का आज निधन हो गया। सत्यपाल मलिक पिछले कुछ समय से गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे। मई, 2025 में उन्हें दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
उन्हें मूत्र मार्ग संक्रमण (UTI) और किडनी फेल्योर जैसी गंभीर चिकित्सकीय समस्याएं थीं, जिनकी वजह से उन्हें ICU में रखा गया। इलाज के दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई, और अंततः आज 5 अगस्त 2025 की दोपहर को उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 78 वर्ष के थे। उनके निधन की पुष्टि होते ही देशभर में शोक की लहर दौड़ गई, और उन्हें याद किया गया एक ऐसी निर्भीक आवाज़ के तौर पर, जो अंतिम समय तक सत्ता से सवाल पूछती रही।
सत्यपाल मलिक का जन्म 24 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गाँव में एक सामान्य जाट किसान परिवार में हुआ था। खेत, खलिहान और मिट्टी की खुशबू में पले-बढ़े सत्यपाल जी के भीतर समाज के लिए कुछ कर गुजरने की जिद बचपन से थी। उनकी सोच और समझ को आकार मिला उस दौर से, जब देश में किसान आंदोलनों और समाजवादी राजनीति की गूंज थी।
राजनीति में उनकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में हुई, जिनसे उन्होंने किसानों की राजनीति, ईमानदारी और सत्ता से टकराने की सीख ली। यहीं से सत्यपाल मलिक का जीवन जनता और जनहित के लिए समर्पित हो गया।
वो 1980 में राज्य सभा सांसद बने और 1989 में अलीगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए। उन्होंने राजनीति में रहते हुए कई दलों का साथ किया, लेकिन विचारों से हमेशा किसान, नौजवान और आम जनता के हक़ की बात करने वाले बने रहे।
बाद में वो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और लंबे समय तक वरिष्ठ पदों पर रहे। लेकिन सत्ता के भीतर रहते हुए भी, वे सत्ता के खिलाफ सच बोलने से कभी नहीं डरे। जब प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इर्द-गिर्द एक अंधभक्त माहौल बन चुका था, तब भी सत्यपाल मलिक ने पुलवामा हमले, किसान आंदोलन, अडानी जैसे मुद्दों पर खुलकर बयान दिए।
उन्होंने साफ कहा- “मुझे मालूम है मैं क्या बोल रहा हूँ, और इसके क्या परिणाम हो सकते हैं, लेकिन मैं चुप नहीं बैठ सकता।”
वे बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय के राज्यपाल रहे, लेकिन किसी भी राज्य में वे सरकार की कठपुतली नहीं बने- उन्होंने राज्यपाल रहते हुए भी जनता की तरफ खड़े होने का साहस दिखाया।
आज जब वे इस दुनिया से चले गए हैं, तो लगता है जैसे फासीवादी दौर में सच बोलने वाला एक मजबूत स्तंभ ढह गया। सत्यपाल मलिक सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वे एक चेतावनी थे-कि अगर लोकतंत्र को बचाना है, तो डर से लड़ना होगा।
सरकार और सत्ता उनके पीछे पड़ी रही- पर सत्यपाल मलिक डटे रहे। उन्हें चुप कराने की तमाम कोशिशें हुईं, लेकिन वो हर बार कहते रहे — “मैं झुकने के लिए नहीं बना, सच कहने के लिए बना हूँ।”
उन्होंने न सत्ता की चुप्पी खरीदी, न पद की लालसा में सिद्धांत बेचे। वे अंत तक एक सच्चे जननायक की तरह जिए- और सच के लिए खड़े होकर दुनिया से रुख़सत हुए।
जो संसद और सड़क के बीच पुल बनती थी- अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। सत्यपाल मलिक नहीं रहे, लेकिन सच बोलने का साहस पीछे छोड़ गए हैं।
(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)